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अध्याय 1

जन्म से पहले की कृपा

मेरी आध्यात्मिक यात्रा शायद मेरे जन्म से पहले ही आरम्भ हो चुकी थी।

माताजी एक घटना बड़े भावुक हृदय से सुनाया करती थीं। जब मैं उनके गर्भ में था और मेरे जन्म का समय निकट आ चुका था, उसी समय हमारे गाँव में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। माताजी की तीव्र इच्छा थी कि वे कथा का एक भी दिन छोड़े बिना सम्पूर्ण श्रवण करें।

उन्होंने आँसू भरी प्रार्थना के साथ प्रभु से कहा— “हे भगवान! मेरे बच्चे का जन्म तब तक न हो, जब तक आपकी यह पावन कथा पूर्ण न हो जाए।”

कहते हैं कि सच्चे मन से निकली पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती। कथा के सभी दिन बीत गए, श्रद्धालु अपने घर लौट गए, लेकिन मेरा जन्म तब भी नहीं हुआ।

मैं लगभग दस महीने पूर्ण होने के बाद इस संसार में आया। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शायद यह केवल संयोग नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है मानो परमात्मा ने मेरे जीवन का पहला संस्कार जन्म से पहले ही कर दिया था।

कथा के पवित्र शब्द, संतों की वाणी और भक्ति का वातावरण मेरे जीवन की नींव बन चुके थे।

माताजी यह भी बताया करती थीं कि जब मेरा जन्म हुआ तो मैं रोया नहीं। दाई और परिवार के लोग कुछ क्षणों के लिए घबरा गए, लेकिन बाद में पता चला कि मैं पूर्णतः स्वस्थ था।

जब भी मैं यह बात सुनता हूँ, मेरा हृदय भीतर तक भाव-विभोर हो उठता है। ऐसा लगता है जैसे संसार में मेरा पहला परिचय शोर से नहीं, बल्कि मौन से हुआ था।

आज मुझे लगता है कि कथा का संस्कार और जन्म का वह मौन, दोनों मेरे भविष्य की आध्यात्मिक यात्रा के संकेत थे।

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