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अध्याय 20

समर्पण की चरम अवस्था

समर्पण का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है।

समर्पण का अर्थ है— कर्तापन छोड़ देना।

हाथ कर्म करते रहें, लेकिन हृदय यह जानता रहे कि वास्तविक कर्ता परमात्मा है। हम केवल उसके हाथों के साधन हैं।

जैसे बाँसुरी स्वयं कोई धुन नहीं बनाती; वह केवल रिक्त होती है। जब श्रीकृष्ण उसे अधरों पर रखते हैं, तभी मधुर स्वर फूटते हैं।

उसी प्रकार जब साधक अपने अहंकार को रिक्त कर देता है, तब गुरु उसके जीवन से दिव्य संगीत प्रकट करते हैं।

धीरे-धीरे मेरे भीतर शिकायतों का स्थान कृतज्ञता ने ले लिया और भय की जगह विश्वास ने जन्म लिया।

जीवन इच्छाओं का बोझ नहीं रहा। वह एक सतत प्रार्थना बन गया।

अब भीतर से केवल एक पुकार उठती है— “जो तू कहे करूँ मैं वही, ऐसा दो वरदान कोई।”

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