जीवन की यात्रा में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो बाहर से देखने पर सामान्य दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से वे सम्पूर्ण जीवन की दिशा बदल देते हैं। मेरे जीवन में भी ऐसा ही एक क्षण आया।
हमारे घर में एक पूजा कक्ष था। प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल वहाँ दीपक जलता, अगरबत्ती की सुगंध वातावरण में फैलती और पूरा घर एक विशेष शांति से भर जाता।
यह उन दिनों की बात है जब मैं कॉलेज में पढ़ता था। एक दिन मैं पूजा कक्ष के बाहर बैठकर पढ़ाई कर रहा था। दरवाजा खुला था और भीतर मेरे इष्टदेव की मूर्ति विराजमान थी।
अचानक मेरी दृष्टि मूर्ति पर पड़ी। मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो वहाँ से कोई अदृश्य शक्ति मेरी ओर प्रवाहित हो रही हो। अगले ही क्षण मेरे पूरे शरीर में तीव्र कंपन दौड़ गया।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे साथ क्या हुआ। वह अनुभव कुछ क्षणों का था, लेकिन उसने मेरे भीतर कुछ बदल दिया। उसके बाद मेरा मन पहले जैसा नहीं रहा।
धीरे-धीरे धार्मिकता के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ने लगा। मंदिर जाना अच्छा लगने लगा, कथा-कीर्तन सुनने में आनंद आने लगा और भजन सुनते समय मन भाव-विभोर होने लगा।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह परमात्मा की पहली दस्तक थी—एक संकेत कि जीवन केवल पढ़ाई, नौकरी, परिवार और संसार तक सीमित नहीं है; इसके पीछे कोई गहरा उद्देश्य भी है।