सेवा, भजन और धार्मिक आयोजनों के बीच मेरा जीवन आगे बढ़ रहा था। बाहर से मैं एक सामान्य युवक था, लेकिन भीतर कुछ और ही घटित होने लगा था।
कभी-कभी ध्यानावस्था में या रात्रि के शांत क्षणों में मुझे मस्तिष्क के मध्य एक दिव्य ज्योति दिखाई देती। वह अनुभव सांसारिक प्रकाश से भिन्न था।
धीरे-धीरे कुछ और विलक्षण अनुभव भी होने लगे।
लेकिन इन अनुभवों के बीच मेरे भीतर एक बात स्पष्ट थी—ये अनुभव अंतिम लक्ष्य नहीं हैं।
ये केवल मार्ग के संकेत हैं, मंजिल नहीं।
मेरे हृदय की वास्तविक प्यास उस शक्ति को जानने की थी जो इन सभी अनुभवों के पीछे कार्य कर रही थी।