गुरु जी से प्रेम करते-करते मेरे भीतर जो अहंकार रूपी रोग था, वह धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
पहले जीवन में “मैं” का भाव प्रबल था—मेरी इच्छा, मेरा विचार, मेरी सफलता और मेरी पहचान।
लेकिन सतगुरु के प्रेम की अग्नि में यह “मैं” धीरे-धीरे पिघलने लगा और उसकी जगह “तू ही तू” का भाव जागने लगा।
सच्चे प्रेम की गली अत्यंत संकरी है। उसमें दो का प्रवेश संभव नहीं।
संत कबीर ने इसी सत्य को सरल शब्दों में कहा है— “जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहीं। प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥”
मेरे जीवन में भी धीरे-धीरे यही अनुभूति गहरी होने लगी।
जहाँ पहले मेरी इच्छाएँ थीं, वहाँ अब गुरु की इच्छा सर्वोपरि होने लगी।