समय बीतता गया।
एक दिन गुरु जी ने शरीर त्याग दिया, लेकिन उनका साथ कभी नहीं छूटा।
ध्यान में, भजन में, सत्संग में और सेवा में अनेक बार उनकी उपस्थिति का अनुभव हुआ।
तब समझ आया कि गुरु केवल शरीर नहीं हैं।
शरीर एक माध्यम है। सच्चा गुरु वह चेतना है जो शिष्य के हृदय में जागकर उसे परमात्मा तक पहुँचाती है।
आज भी जब मुझे गुरु जी के वे शब्द याद आते हैं— “जिया लाल, क्या हाल है?”—तो आँखें नम हो जाती हैं।
कुछ प्रश्नों के उत्तर शब्दों में नहीं दिए जा सकते। कभी-कभी आँसू ही सबसे सच्ची प्रार्थना बन जाते हैं।