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अध्याय 10

दीक्षा — जीवन का नया जन्म

लगभग छह महीने तक मैं संत की चर्चा अपने मित्र के साथ करता रहा। उनसे मिलने की तड़प बढ़ती गई।

अंततः 22 अगस्त 1994 का वह शुभ दिन आया जब मुझे गुरु जी से दीक्षा प्राप्त हुई।

वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। वह मेरे जीवन का नया जन्म था।

अब मेरे जीवन को दिशा मिल चुकी थी। प्रातः भजन-सिमरन, दिन में नौकरी और सायंकाल पुनः साधना—यही मेरी दिनचर्या बन गई।

सुबह और शाम लगभग तीन-तीन घंटे अभ्यास करता और शेष समय अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करता।

धीरे-धीरे जीवन में संतुलन आने लगा—संसार भी चल रहा था और साधना भी।

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