दिसंबर 1994 में गुरु जी का एक सत्संग हुआ। सत्संग के दौरान उनके मुख से यह भाव निकला कि जो लोग नौकरी छोड़कर अपना जीवन परमार्थ में लगा सकते हैं, वे ऐसा करें।
ये शब्द मेरे हृदय को भीतर तक छू गए।
अगले दिन मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और सीधे गुरु जी के पास पहुँच गया।
गुरु जी ने मुस्कुराकर पूछा— “नौकरी कच्ची थी या पक्की?”
मैंने कहा— “कच्ची थी।”
वे मुस्कुराए और बोले— “यहाँ पक्की नौकरी है।”
इन शब्दों में प्रेम भी था और शिक्षा भी।
मैं लगभग पंद्रह दिन उनके पास रहा। उन दिनों उनके सान्निध्य में रहना, सेवा करना और उनकी निकटता प्राप्त करना मेरे जीवन की अमूल्य पूँजी बन गया।