जब मैंने घर लौटने की अनुमति माँगी तो गुरु जी ने मुस्कुराकर पूछा— “शादी करोगे?”
मैंने कहा— “हाँ जी।”
उन्होंने कहा— “पत्नी को भी दीक्षा दिलवा देना। तुम दोनों नियमित रूप से दो-तीन घंटे भजन-अभ्यास करते रहना। तुम्हें भगवान की प्राप्ति हो जाएगी।”
उस दिन मेरी एक बड़ी भ्रांति दूर हुई।
मैं समझता था कि शायद अध्यात्म का अर्थ संसार छोड़ देना है। लेकिन गुरु जी ने सिखाया कि सच्चा अध्यात्म संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए परमात्मा से जुड़ना है।
गृहस्थ जीवन भी साधना का मार्ग बन सकता है, यदि उसमें भजन, सेवा और समर्पण जुड़ जाए।
इसके बाद मेरा विवाह 9 मई 1995 को हुआ। मेरी पत्नी ने भी दीक्षा ली और हम दोनों नियमित भजन-सिमरन का अभ्यास करते रहे।