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अध्याय 13

सेवा से सत्संग तक

गुरु जी से पुनः भेंट होने पर मुझे सत्संग और नामदान की सेवा की आज्ञा मिली।

मैं अपने आसपास के गाँवों में शाम को सत्संग देने जाने लगा। धीरे-धीरे हिमाचल के दूर-दराज क्षेत्रों में भी सत्संग और नामदान की सेवा करने के अवसर मिलने लगे।

सेवा मेरे लिए केवल कोई कार्य नहीं थी। वह गुरु-कृपा का माध्यम बनती चली गई।

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