गुरु जी से पुनः भेंट होने पर मुझे सत्संग और नामदान की सेवा की आज्ञा मिली।
मैं अपने आसपास के गाँवों में शाम को सत्संग देने जाने लगा। धीरे-धीरे हिमाचल के दूर-दराज क्षेत्रों में भी सत्संग और नामदान की सेवा करने के अवसर मिलने लगे।
सेवा मेरे लिए केवल कोई कार्य नहीं थी। वह गुरु-कृपा का माध्यम बनती चली गई।