एक शाम सत्संग समाप्त करके लौटते समय एक दुर्घटना में मेरे घुटने में चोट लगी। समय बीतने के बाद भी दर्द बना रहा।
एक दिन गुरु जी के सत्संग में मैं दर्द से परेशान होकर सीढ़ियों पर बैठ गया।
मैंने मन ही मन प्रार्थना की— “गुरु जी, आपकी सेवा करते हुए यह चोट लगी है। अब इसकी सुध भी आप ही लीजिए।”
कुछ देर बाद जब मैं उठा और चलकर देखा, तो घुटने का दर्द समाप्त हो चुका था।
मैंने कई बार घुटना मोड़कर देखा, लेकिन दर्द का नामोनिशान नहीं था।
उस दिन मैंने प्रार्थना की वास्तविक शक्ति का अनुभव किया।
सच्ची प्रार्थना केवल शब्द नहीं होती; वह आत्मा की पुकार होती है।