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अध्याय 15

गुरु-कृपा और सेवा का विस्तार

एक समय मेरे जीवन में सेवा का कार्य तेजी से बढ़ने लगा। दिन में नौकरी और शाम से देर रात तक सेवा—यह क्रम चलता रहा।

एक ठंडी दिसंबर की रात सेवा करते समय नदी के किनारे गुरु जी के अचानक दर्शन हुए। उन्होंने मुझ पर कृपादृष्टि डाली और कुछ क्षण तक मुझे देखते रहे।

उस घटना के बाद सत्संग की सेवा में मेरे भीतर एक गहरा परिवर्तन अनुभव हुआ।

ऐसा लगता था जैसे मेरे भीतर से कोई और बोल रहा हो और मैं केवल माध्यम हूँ।

तब मुझे भीतर से यह भाव समझ आने लगा— कर्ता गुरु हैं; शरीर केवल निमित्त है।

यही भाव आगे चलकर मेरे जीवन में समर्पण की आधारशिला बना।

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