गुरु और शिष्य का संबंध संसार के किसी भी संबंध से अलग होता है। यह शरीर का नहीं, आत्मा का संबंध है।
एक समय गुरु जी का स्वास्थ्य बहुत कमजोर हो गया और वे एकांत में रहने लगे। सामान्य रूप से लोगों से मिलना बहुत कम हो गया।
उन दिनों मेरे हृदय में उनके दर्शन की तीव्र लालसा रहती थी।
सुबह, शाम, दिन और रात—मन में केवल एक ही विचार रहता— “कब गुरु जी के दर्शन होंगे?”
फिर एक दिन वह शुभ अवसर आया।
बहुत दिनों बाद जब मैं उनके दर्शन के लिए पहुँचा, उन्होंने मुझे देखकर प्रेमपूर्वक पूछा— “जिया लाल, क्या हाल है?”
बस इतना सुनना था कि मेरे भीतर का बाँध टूट गया। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
वे आँसू दुःख के नहीं थे। वे प्रेम की भाषा थे।
उस दिन मैंने अनुभव किया कि जहाँ प्रेम अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, वहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं।