एक अवसर पर मुझे गुरु जी के साथ एकांत में बैठने का अवसर मिला। मैंने अपनी साधना के विषय में उनसे कहा—
“गुरु जी, शब्द-धुन भी सुनाई देती है, ज्योति भी दिखाई देती है, लेकिन आप अंतर में नहीं आते।”
मेरे लिए यह सबसे गहरी आकांक्षा थी कि जिन गुरु के चरणों में मैं बाहर बैठता हूँ, उनका दर्शन भीतर भी हो।
गुरु जी ने मेरी बात सुनकर प्रेम से कहा— “मैं भी आऊँगा।”
कुछ समय बाद ध्यान में वास्तव में गुरु जी का स्वरूप दिखाई देने लगा।
तब मुझे अनुभव हुआ कि संतों का प्रत्येक वचन केवल शब्द नहीं होता; वह कृपा का संकल्प होता है।