जिया लाल
आध्यात्मिक साधक • समाजसेवी • सत्संग प्रेमी
जन्म से मिले संस्कारों से लेकर गुरु की खोज, दीक्षा, सेवा, सत्संग, गुरु-कृपा और अंततः समर्पण तक—यह जीवन-यात्रा भीतर की उस पुकार का वर्णन है जो मनुष्य को परमात्मा की ओर ले जाती है।
जीवन का सार है — सेवा, सिमरन और सदाचार।
यही मार्ग शांति, प्रेम और प्रभु-प्राप्ति की ओर ले जाता है।
एक साधारण जीवन की असाधारण आंतरिक यात्रा
आत्मकथा के मूल भावों को एक शांत, सरल और आध्यात्मिक प्रस्तुति में संजोया गया है।
समर्पण
यह जीवन उस परम शक्ति को समर्पित है जिसने जन्म से पहले संभाला, बचपन से संस्कार दिए, सेवा का मार्ग दिखाया, सच्चे गुरु की खोज की प्यास जगाई और अंततः गुरु के चरणों तक पहुँचाया।
यह साधना और लेखन सद्गुरु के चरणों में समर्पित है।
जीवन-दृष्टि
इस यात्रा में माता-पिता का त्याग, सेवा के संस्कार, गुरु की खोज और प्राप्ति, दीक्षा, गृहस्थ जीवन, सत्संग, गुरु-कृपा, प्रेम और अंततः समर्पण एक ही धारा में जुड़े दिखाई देते हैं।
जन्म से समर्पण तक
आत्मकथा के 20 अध्यायों की संक्षिप्त, वेब-पठन के लिए अनुकूल प्रस्तुति।
आत्मा की घर-वापसी
अंततः यात्रा बाहर से भीतर और ‘मैं’ से समर्पण की ओर लौटती है।
जन्म से पहले की प्रार्थना, बचपन की करुणा, माता-पिता का त्याग, शिक्षा का संघर्ष, अध्यात्म की पहली पुकार, सेवा के संस्कार, आंतरिक अनुभव, गुरु की खोज, गुरु की प्राप्ति, दीक्षा, गृहस्थ जीवन, सेवा, गुरु-कृपा, विरह, प्रेम और अंततः समर्पण—यही इस जीवन-यात्रा की प्रमुख कड़ियाँ हैं।
जब शिष्य का “मैं” मिट जाता है, तब गुरु का “तू” प्रकट होता है। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं से ईश्वर का राज्य आरम्भ होता है। तब जीवन का प्रत्येक क्षण साधना, प्रत्येक श्वास सिमरन और प्रत्येक कर्म सेवा बन जाता है।
“जो तू कहे करूँ मैं वही,
ऐसा दो वरदान कोई।
सतगुरु मेरे प्यारे प्रीतम,
दिल है तू मेरा, जान भी तू ही।”